Friday, December 16, 2011

महाकवि ग़ालिब

ज़ुल्मत कदे में मेरे शब ए ग़म का जोश है
इक शम्मा है दलील ए सहर सो खामोश है

ना मुज्दा ए विसाल ना नज़ारा ए जमाल
मुद्दत हुई के अस्ती ए चश्म ओ गोश है

मैंने किया है हुस्न ए ख़ुदारा को बेहिज़ाब
ऐ शौक याँ इज़ाज़त ए तस्लीम ए होश है

गौहर को इक्द ए गरदान ए खुबाँ में देखना
क्या औज़ पर सितारा ए गौहर फरोश है

दीदार वादा हौसला साक़ी निगाहे मस्त
बज्में ख़याल मैयक़दा ए बेखरोश है

ऐ ताज़ा वारीदान ए बिसात ए हवा ए दिल
जिन्हार अगर तुम्हें हवस ए नावनोश है

देखो मुझे जो दीदा ए इबरत निगाहो
मेरी सुनो जो गोश ए नसीहत निओस है

साक़ी बाजलवा दुश्मन ए ईमान ओ आगही
मुतारिब बा नगमा रहजान ए तम्कीनो होश है

या शब को देखते थे के हर गोशा ए बिसात
दामां ए बागबां ओ कफ़ ए गुलफरोश है

लुत्फ़ ए खिराम ए साक़ी ओ जौक ए सदा ए चंग
ये जन्नत ए निगाह वो फिरदौश ए गोश है

या सुब्ह ओ दम जो देखिये आकर तो बज्म में
नय वो शुरुर ओ शोर ना जोशो खरोश है

दाग ए फ़िराक ए सोहबत ए शब की जली हुई
एक शम्मा रह गयी है सो वो भी खामोश है

आते हैं ग़ैब से ये मज़ामीन ख़याल में
ग़ालिब सरीर ए खामा नवा ए सरोश है

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